UNEP Emissions Gap Report 2025: बढ़ते तापमान और घटती जलवायु प्रतिबद्धताएँ

UNEP Emissions Gap Report 2025: बढ़ते तापमान और घटती जलवायु प्रतिबद्धताएँ

🌍 UNEP Emissions Gap Report 2025: बढ़ते तापमान और घटती जलवायु प्रतिबद्धताएँ

(Syllabus: Climate and Energy | Source: United Nations Environment Programme – UNEP)


संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने हाल ही में अपनी 16वीं वार्षिक रिपोर्ट “Emissions Gap Report 2025: Off Target” जारी की है।
इस रिपोर्ट ने वैश्विक समुदाय को चेतावनी दी है कि नए जलवायु वादों (climate pledges) के बावजूद, दुनिया अभी भी 2.3°C से 2.5°C तक के तापमान वृद्धि के मार्ग पर है —
जो पेरिस समझौते (Paris Agreement) के 1.5°C लक्ष्य से काफी अधिक है।

इस रिपोर्ट का सार यह है कि “हमारे वादे और हमारे कार्यों में अभी भी गहरी खाई बनी हुई है।”


  • यह UNEP की वार्षिक रिपोर्ट है, जो वैश्विक स्तर पर किए गए Nationally Determined Contributions (NDCs) और वास्तविक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (GHG Emissions) के बीच अंतर (Gap) को मापती है।
  • इसका उद्देश्य यह बताना है कि मौजूदा नीतियाँ और प्रतिबद्धताएँ किस हद तक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C या 2°C तक सीमित रखने में सक्षम हैं।
  • प्रकाशक संस्था: United Nations Environment Programme (UNEP)
  • संस्करण: 16वाँ संस्करण (2025)
  • मुख्य लक्ष्य: जलवायु नीति, प्रगति और वित्तीय अंतराल (finance gap) की समीक्षा कर व्यावहारिक समाधान सुझाना।

  • वर्तमान नीतियों के अनुसार दुनिया का तापमान 2.8°C तक बढ़ने की संभावना है।
  • जबकि, देशों के मौजूदा NDCs लागू होने पर भी यह वृद्धि 2.3°C–2.5°C तक रहने का अनुमान है।
    ➡️ इसका अर्थ है कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों से दुनिया अब भी बहुत दूर है।

  • पिछले वर्षों की तुलना में गणना पद्धतियों में बदलाव और अमेरिका के कुछ समय के लिए पेरिस समझौते से बाहर होने से सुधार सीमित रहा
  • जलवायु महत्वाकांक्षा (Climate Ambition) ठहरी हुई है, बढ़ी नहीं।

  • पेरिस लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, 2019 के स्तर से उत्सर्जन में 2035 तक
    • 2°C के लिए 35%,
    • और 1.5°C के लिए 55% की कमी लानी होगी।
  • यह मानव इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा कटौती लक्ष्य होगा।

  • रिपोर्ट बताती है कि 2035 तक 1.5°C की सीमा लांघी जा सकती है।
  • इसका मतलब है कि भविष्य में पृथ्वी को ठंडा करने के लिए नकारात्मक उत्सर्जन (negative emissions) तकनीकों की आवश्यकता पड़ेगी।

  • ऊर्जा, उद्योग, परिवहन और कृषि क्षेत्र अब भी सबसे बड़े उत्सर्जक हैं।
  • जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भरता घटने के बजाय कई जगह बढ़ी है।

  • सौर, पवन और बैटरी तकनीकें अब सस्ती और सुलभ हैं,
    लेकिन विकासशील देशों में वित्तीय कमी इन तकनीकों के विस्तार में बाधा बनी हुई है।

  • बढ़ते वैश्विक ऋण, कमजोर जलवायु वित्त (climate finance) और अंतरराष्ट्रीय असहयोग ने वैश्विक कार्बन कटौती की गति को धीमा कर दिया है।

1. तापमान अनुमानों में कमी
2015 में जहाँ वैश्विक तापमान वृद्धि का अनुमान 3–3.5°C था,
वहीं अब यह घटकर लगभग 2.4°C रह गया है — जो एक धीमी परंतु सकारात्मक प्रगति है।

2. तकनीकी उपलब्धता:
नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी भंडारण में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।

3. NDC कवरेज में वृद्धि:
अब लगभग 90% वैश्विक उत्सर्जन राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में शामिल है,
जो वैश्विक भागीदारी और जवाबदेही को दर्शाता है।


1. अपर्याप्त महत्वाकांक्षा (Insufficient Ambition):
नए NDC अपडेट से वैश्विक तापमान अनुमान केवल 0.1°C घटा है —
यानी 2.3–2.5°C तक की वृद्धि अब भी कायम है।

2. वित्तीय अंतराल (Finance Gap):

  • जलवायु वित्त प्रवाह को 2030 तक तीन गुना बढ़ाना होगा,
    लेकिन वर्तमान में केवल एक-तिहाई फंडिंग उपलब्ध है।

3. क्रियान्वयन की कमी (Implementation Deficit):
G20 देशों में से केवल 9 देश ही अपने वादों पर सही दिशा में हैं।

4. कार्बन कैप्चर पर अत्यधिक निर्भरता:
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि Carbon Dioxide Removal (CDR) और Direct Air Capture (DAC) तकनीकें अभी महंगी और अपरिक्षित हैं।

5. ऊर्जा संकट और भू-राजनीति:
2022 के बाद से कई देशों ने पुनः जीवाश्म ईंधनों में निवेश बढ़ाया,
जिससे $1.3 ट्रिलियन से अधिक सब्सिडी दी गई —
यह जलवायु लक्ष्यों के विरुद्ध है।


  1. तात्कालिक उत्सर्जन कटौती:
    • 2035 तक वार्षिक वैश्विक उत्सर्जन में
      • 2°C के लिए 35%,
      • 1.5°C के लिए 55% कमी लानी होगी।
    • कोयला और तेल का चरणबद्ध समापन (phase-out) आवश्यक है।
  2. जलवायु वित्त बढ़ाएँ:
    • अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढाँचे में सुधार करें,
      • Debt Swap,
      • Concessional Financing,
      • Private Green Investment को प्रोत्साहन दें।
  3. अंतरराष्ट्रीय सहयोग सशक्त करें:
    • Loss and Damage Fund को सक्रिय करें,
    • तकनीकी साझेदारी (Technology Sharing) बढ़ाएँ।
  4. अनुकूलन और लचीलापन (Adaptation & Resilience):
    • राष्ट्रीय बजट में जलवायु अनुकूलन को शामिल करें,
    • संवेदनशील समुदायों की रक्षा करें।
  5. जीवाश्म ईंधन सब्सिडी समाप्त करें:
    • वर्तमान में जीवाश्म सब्सिडी स्वच्छ ऊर्जा की तुलना में 5 गुना अधिक है।
  6. विकासशील देशों को सशक्त करें:
    • स्वच्छ ऊर्जा फंड और तकनीकी प्रशिक्षण की पहुँच सुनिश्चित करें।
  7. निगरानी तंत्र मजबूत करें:
    • वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन और वित्त की पारदर्शी निगरानी प्रणाली विकसित करें।

UNEP Emissions Gap Report 2025 ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि महत्त्वाकांक्षा और क्रियान्वयन में अंतर अब भी बहुत बड़ा है।
1.5°C लक्ष्य को बचाए रखने के लिए केवल तकनीक नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वित्तीय सुधार और वैश्विक एकजुटता की आवश्यकता है।

🌱 हर अंश डिग्री की बचत, हर प्रयास का मूल्य रखती है — क्योंकि यही तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पृथ्वी कितनी सुरक्षित रहेगी।


घटकविवरण
प्रकाशक संस्थाUnited Nations Environment Programme (UNEP)
रिपोर्ट शीर्षक“Off Target”
संस्करण16वाँ (2025)
अनुमानित तापमान वृद्धि2.3–2.5°C (NDCs के साथ), 2.8°C (वर्तमान नीतियाँ)
मुख्य चुनौतीउत्सर्जन अंतर और जलवायु वित्त की कमी
मुख्य समाधानतात्कालिक उत्सर्जन कटौती, वित्तीय सुधार, अंतरराष्ट्रीय सहयोग
महत्वपूर्ण निष्कर्षवैश्विक महत्वाकांक्षा स्थिर, क्रियान्वयन कमजोर
लक्ष्य वर्ष2035 तक 35–55% उत्सर्जन कमी

Q1. UNEP Emissions Gap Report क्या है?
यह एक वार्षिक रिपोर्ट है जो देशों की जलवायु प्रतिबद्धताओं (NDCs) और वास्तविक उत्सर्जन के बीच अंतर (Gap) का आकलन करती है।

Q2. 2025 रिपोर्ट की मुख्य चेतावनी क्या है?
दुनिया अब भी 2.3–2.5°C तापमान वृद्धि की राह पर है, जो पेरिस समझौते के लक्ष्यों से कहीं अधिक है।

Q3. 1.5°C लक्ष्य क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि इससे अधिक तापमान वृद्धि पर हीटवेव, बाढ़, और खाद्य असुरक्षा जैसी आपदाएँ तीव्र हो जाती हैं।

Q4. रिपोर्ट के अनुसार क्या किया जाना चाहिए?
तात्कालिक उत्सर्जन कटौती, जलवायु वित्त में वृद्धि, और विकासशील देशों के लिए तकनीकी सहायता।

Q5. भारत के लिए क्या संकेत हैं?
भारत को अपनी नवीकरणीय ऊर्जा, EV, और ग्रीन हाइड्रोजन नीति को तेज़ करना होगा ताकि वह 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में अग्रसर रह सके।